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Showing posts from September, 2022

अवतार व देवता कैसे बने

                वस्तुतः वैष्णव धर्म के अवतारवाद में विष्णु को मुख्य संरक्षक और ईश्वर माना गया है और उसी के अनुरूप गुप्त शासकों ने दैवीय उत्पत्ति के सिद्धान्त को मान्यता देते हुए स्वयं को परमभागवत की उपाधि से विभूषित किया गया तथा विष्णु के दस अवतारों जैसे-मत्स्य,कूर्म,वराह,नृसिंह,बामन, परसुराम,राम,कृष्ण,बुद्ध और कल्कि को स्वीकृत और स्थापित किया गया।               वास्तव में,इन प्रमुख अवतारों को सामान्य कल्पना न मानकर साम्राज्य विस्तार के पश्चात एक केंद्रीयकृत व्यवस्था का आधारभूत व् मजबूत अंग माना जा सकता है क्योंकि गुप्तों के साम्राज्य विस्तार के पश्चात स्थानीय शासकों एवं प्रजा/जनता के द्वारा विद्रोह किये जाने की आशंका सदैव बलवती रही है इसीलिए क्षेत्रीय बाहुल्यता के आधार पर इन दैवीय प्रतीकों को विष्णु का अवतार बनाकर यही विचार प्रकट किया गया कि जिस प्रकार वे विष्णु के अवतार हैं उसी प्रकार परमभागवत गुप्तशासक के अधीन आप हैं और परमभागवत का विरोध मूलतः ईश्वर विष्णु का विरोध है,चूंकि इस काल तक वैष्णव धर्म का व्यापक प्रस...

वेदिक ईश्वर का लूट

  वेदिक ईश्वर का लूट मत: । अनार्य , मालेछ, असुर , वेद निंदक यानी वेदिक आर्य का दुश्मन को हत्या, मार काट कर के उनके धन संपति लूटने का वेदिक ईश्वर का आदेश : *निर्ह॑स्ताः सन्तु॒ शत्र॒वोऽङ्गै॑षां म्लापयामसि। अथै॑षामिन्द्र॒ वेदां॑सि शत॒शो वि भ॑जामहै ॥ पद पाठ नि:ऽहस्ता: । सन्तु । शत्रव: । अङ्गा । एषाम् । म्लापयामसि । अथ । एषाम् । इन्द्र । वेदांसि । शतऽश: । वि । भजामहै ॥६६.३॥ अथर्ववेद » काण्ड:6» सूक्त:66 मंत्र ३ पण्डित क्षेमकरणदास त्रिवेदी । पदार्थान्वयभाषाः - (शत्रवः) शत्रु लोग (निर्हस्ताः) निहत्थे (सन्तु) हो जावें, (तेषाम्) उन के (अङ्गा) अङ्गों को (म्लापयामसि) हम शिथिल करते हैं। (अथ) फिर (इन्द्र) हे महाप्रतापी सेनापति इन्द्र ! (तेषाम्) उन के (वेदांसि) सब धनों को (शतशः) सैकड़ों प्रकार से (वि भजामहै) हम बाँट लेवें ॥३॥ भावार्थभाषाः - विजयी वीर पुरुष शत्रुओं को जीत कर सेनापति की आज्ञा अनुसार राजविभाग निकाल कर उनका धन बाँट लेवें ॥३॥ । जो युद्ध - युद्ध मे धन से जिताने वाला वैदिक ईश्वर उनके लिए धन को उत्पन्न करता है । युद्व में जीती हुई अनार्य का धन संपत्ति वेदिक ईश्वर आपने भक्तों को दिलाते है...

संघी आतंकी लिस्ट

  भारत में बम ब्लास्ट में शामिल आतंकवादी  हिन्दू  की लिस्ट :- १ सुनील जोशी - मऊ , मध्य प्रदेश का आरएसएस का प्रचार प्रमुख १९९० से २००३  २ संदीप डांगे - आरएसएस का प्रचार प्रमुख :शाजापुर , मध्य प्रदेश , २००५ से २००८  ३ देवेन्द्र गुप्ता जामताड़ा झारखण्ड का आरएसएस का जिला प्रचार प्रमुख  ४ लोकेश शर्मा -आरएसएस का नगर कार्यवाहक देवगढ़।  ५ चंद्रकांत लावे - आरएसएस का जिला प्रचार प्रमुख :शाजापुर , मध्य प्रदेश , २००८ से २०१०  ६ स्वामी असिमांंनन्द - आरएसएस का सबसे पुराना और सर्वोच्च नेता।  ७ राजेंद्र उर्फ़ समुन्दर - आरएसएस वर्ग विस्तारक।  ८ मुकेश वासनी -गोधरा का आरएसएस का कार्यकर्त्ता  ९ रामजी कालसांगरा - आरएसएस का कार्यकर्त्ता  १० कमल चौहांन - आरएसएस का कार्यकर्ता  ११ साध्वी Pradnya सिँघ ठाकुर , आरएसएस की कार्यकर्ता जो वन्दे मातरम और अभिनव भारत से जुडी है ! १२ राजेंद्र चौधरी उर्फ़ रामबालक दास -आरएसएस का कार्यकर्ता  १३ धन सिंह उर्फ़ लक्ष्मण - आरएसएस का कार्यकर्ता  १४ राम मनोहर कुमार सिंह  १५ तेज राम उर्फ़ रामजी उर्फ़ राम...

वैदिक ईश्वर स्वरुप

   ईश्वर कहा है और  कैसा दिखता है  अर्थात : - वैदिक ईस्वर की नाभ  अनेक सूर्य लोको की है , दोनों  कूल्हे बृहस्पति लोक के थे  पूछ गतिमान वायु की तरह उससे वह पेड़ो को हिलाता है ।  ( अथर्वेद 9 : 4 :14 )     गूदा की  नदियां है ,  त्वचा  सूर्य की धूप है  पैरो को उठने वाले है । ( अर्थवेद 9 : 4 : 14 ) * सूर्य सिर है । * अग्नि माथा है । * वायु आवाज़ है । * चन्द्र भेजा है । * आकाश ऊपर का जबड़ा है । *पृथ्वी नीचे का जबड़ा है । * बिजली  जीभ है । * नक्षत्र  गला है । * तारे कंधे है । * चलेने वाला सूरज गोद है । * मध्य अवकाश पेट है । * बृहस्पति हाथ है । * बड़ी दिशा हसली की हड्डियां है । * अग्नि , वायु  ओर अपन वायु पसलि कि हड्डिय है । * प्राण वायु दोनों कंधे है । * बादल लंबी हाथ है । * शोधक प्रदार्थ बालो के जुड़ा है । * ब्राह्मण तत्व और ष्ट्रीयतत्व  दोनों कुल्ह है । * बल दोनों  जांघ है । * सविता दोनों  घुटने है ।   वर्कको दोनों अण्डकोष है । * नदी नाडिया है । * स्तन बादल है । (अथर्वेद 9 : 7 : 1 to 14 ) ( ऋग्...

हिन्दू धर्म औ शब्द उतपत्ती

 हिंदू धर्म के बारे में चौंकाने वाला सच (आतंकवाद प्राचीन पंथ) और इसकी उत्पत्ति हिंदू इतिहास, विश्वासों और विचारों का वर्तमान स्वरूप उस प्रचार का परिणाम है जो अंग्रेजों द्वारा भारत में प्रचलित सती (दुल्हन को जलाने), अस्पृश्यता जैसी बर्बर प्रथाओं और मान्यताओं में सुधार के लिए पहल करने के बाद शुरू हुआ था। प्रचार आर्य समाज, ब्रह्म समाज आदि जैसे समाजों द्वारा शुरू किया गया था और पश्चिम में विवेकानंद के नेतृत्व में था। अंग्रेजों द्वारा "हिंदू धर्म" शब्द गढ़ने के बाद उनका काम आसान हो गया, जिसमें भारत के लोगों द्वारा प्रचलित मान्यताओं और पंथों का वर्णन किया गया था। 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में आरएसएस और हिंदू महासभा की स्थापना के बाद यह प्रचार दुष्कर हो गया। उन्होंने झूठ, छल और कपट के माध्यम से सनातन धर्म की तथाकथित महानता का निर्माण किया। भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद भारत का इतिहास ब्राह्मण शिक्षाविदों द्वारा फिर से लिखा गया, जो पूरी तरह से गलत है और तथ्यों द्वारा समर्थित नहीं है। इसकी उत्पत्ति के बारे में सच्चाई हिंदुत्व के नेताओं और समर्थकों द्वारा दुष्प्रचार के रूप में हिंदू ध...

हिन्दू अत्याचार, जातिवाद,

 ✔शूद्रों को शिक्षा देने वाले सम्बूक ऋषि को किसने मारा? - राम ने। ✔एकलव्य का अंगूठा किसने मांगा? - राम के पुजारियों ने। ✔बाली को धोखे से किसने मारा? - राम ने। ✔ शूद्रों को पढ़ने-लिखने का अधिकार कब नहीं था? - रामराज्य में। ✔महिलाओं को पढ़ने- लिखने का अधिकार कब नहीं था? - रामराज्य में। ✔दलितों, पिछड़ों के साथ भेदभाव के ग्रंथ कब लिखे गए?- रामराज्य में। ✔दलितों के साथ अत्याचार कौन करते हैं? - राम को मानने वाले। ✔संविधान को जलाने वाले कौन हैं? - राम को मानने वाले | ✔आरक्षण का विरोध कौन करते हैं? - राम को मानने वाले। ✔ संविधान का विरोध कौन करते हैं?- राम को मानने वाले। ✔ दलितों को मंदिर जाने से कौन रोकते हैं? - राम को मानने वाले। ✔ बीएसपी सरकार मे बने दलित महापुरुषों के नाम पर बने पार्को, स्मारकों के विरोधी कौन थे? - राम को मानने वाले। ✔दलित महापुरुषों की मूर्तियां तोड़ने वाले कौन होते हैं? - राम को मानने वाले। ✔ दलित महापुरुषों की लगने वाली मूर्तियों का विरोध कौन करता है? - राम को मानने वाले। ✔ बुद्ध- धर्म का विरोध कौन करता है? - राम को मानने वाले। _______________________

वेद निंदक, नास्तिक

 वेद निंदक : । तो बात करते हैं वेद निंदक के बारे में । कौन हैं वेद निंदक तो वेद निंदक के बारे में हमे वेद में ही मिल जाते हैं आखिर हैं कौन वेद निंदक? । वेद निंदक कौन होता है ? और उसे दंड देना उचित है अथवा नहीं ?  ‘नास्तिको वेदनिन्दकः’ {विशुद्ध मनु २/११ } अर्थ : जो नास्तिक है वो वेद निंदक कहलाता है। जो वेदों को वेद ग्रंथ को नही मानता वो है वेद निंदक । । जो वेद में लिखा हैं जो वेद में बताया गया है वोही धर्म हैं  ब्राह्मण , वैश्य, क्षत्रिय अपना भला चाहे तो वेद अनुसार चले , विशुद्ध मनुस्मृति ११/१०८ आर्य से जो भिन्न है वो सब दस्यु यानी दुष्ट, मलेच्छ हैं  मनु १०/४५ नास्तिको यानी वेद निंदक के ऊपर वेदिक ईश्वर का दादागिरी ।। । वे जो मुझ इन्द्र (वेदिक ईश्वर)– को-ऐश्वर्यवाले परमात्मा को जो नहीं जानते और मानते, ऐसे नास्तिक-शत्रु-विरोधी मेरी क्यों निन्दा करते हैं, अतः वे दण्डभागी होंगे ॥ । , अ॒भी॒३॒॑दमेक॒मेको॑ अस्मि नि॒ष्षाळ॒भी द्वा किमु॒ त्रय॑: करन्ति । खले॒ न प॒र्षान्प्रति॑ हन्मि॒ भूरि॒ किं मा॑ निन्दन्ति॒ शत्र॑वोऽनि॒न्द्राः ॥ । अ॒भि । इ॒दम् । एक॑म् । एकः॑ । अ॒स्मि॒ । नि॒ष्षाट् ...

दयानंद भंडा फोड़

 स्वामी दयानंद भारत में ईसाई मिशनरी का सबसे बड़े ऐजेंटो में से एक थे दयानंद न केवल थियोसोफिकल सोसायटी के सदस्य रहे बल्कि थियोसोफिकल सोसायटी के संस्थापकों को पत्र लिखकर उसे भारत में लाने वाले भी दयानंद ही थे  दयानंद थियोसोफिकल सोसायटी से कब कैसे और कब तक जुड़े रहे, ?? आर्य समाज और थियोसोफिकल सोसायटी किस प्रकार एक दूसरे के साथ मिलकर काम करते थे ??  उनका उद्देश्य क्या था ??  ये सब आज शाम तक एक पोस्ट के माध्यम से ठोस प्रमाणों के साथ विस्तार पूर्वक आप सब लोगों को बताऊँगा  जिसे पढके आपको ये समझ में आ जाएगा कि दयानंद वैदिक धर्म के प्रचारक नहीं बल्कि ईसाई मिशनरी के ऐजेंट थे  तो शाम को मिलते हैं तब तक के लिए राम राम ___________________ जिन नवीन-आर्यसमाजियों का उद्देश्य सनातन धर्म ग्रंथों  के उदाहरणों को गलत-संदर्भ में प्रस्तुत करते हुए- सनातनधर्मियों को अपमानित करना व उन्हें नीचा दिखाना, धर्म विरोधीयों की सहायता करना आदि हैं, उनके लिए सप्रेम -------------- दयानंद यजु:भाष्य पूषणम् ............ पायुना कृश्माच्छपिंण्डै: , स्वामी दयानंद इस मंत्र का अर्थ करते हुए लि...

अश्वमेध

 ASHWAMEDA YAJNA FROM VEDAS On the twenty-fifth day, the agniṣṭoma was performed.[22] The agniṣṭoma was the main part of the Soma sacrifice. In the morning pressing, the soma was pressed out and offered along with "rice cakes, parched barley, flour in sour milk, parched rice, and a hot mixture of milk and sour milk". During the pressings and oblations, five musical chants were sung and five recitations were chanted. The priests then partook in the drinking of the soma and the twelve oblations to the seasons, and the sacrifice of a goat to Agni. The midday pressing was similar and dedicated to Indra, and dakshina was also distributed on that day to the priests consisting of a varying multitude of cows. At the evening pressing only two musical chants were sung and two recitations chanted. Then proceeded the conclusory libations to the "yoking of the bay horses" and the sun, followed by the Avabhṛtha. The Avabhṛtha was the "unpurificatory" bathing of the sacr...

मूर्तिपूजा का प्रारम्भ

 मूर्तिपूजा का प्रारम्भ कब क्यो व कैसे ?? 5000 वर्ष पूर्व महाभारत काल तक भारत में विशुद्ध रूप से सभी जन वैदिक धर्म के ही अनुयाई थे। महाभारत के युद्ध के पश्चात ऋषियों की वैदिक  व्यवस्थाओ में शिथिलता आने लगी। वेद के विद्वान जनो की हानि होने लगी। फिर भी 600 ईस्वी पूर्व तक आर्यावर्त में कुछ अशुद्धियों के साथ वैदिक मत ही पूरे आर्यावर्त में विद्यमान था। देश में अभी भी वेद, उपनिषद्, दर्शन आदि वैदिक ग्रंथो का पठन पाठन और प्रचलन था, कई यज्ञशालाऐं भी थीं।  इस समय केवल दो ही समुदाय भारत में थे, एक आर्य और दूसरे अनार्य। आर्यो का मत वेद था और दूसरी ओर अधिकांश आनार्य वाममार्गी थे। वैसे तो संपूर्ण आर्यावर्त में बहुतायत में आर्य जनसंख्या ही थी, लेकिन वेद-विरुद्ध मत वाले वाममार्गियों की भी कुछ छुटपुट जनसंख्या भी थी। वाममार्गी मत में पंच मकार (मांस, मीन, मद्य, मैथुन, मुद्रा) की असभ्यता का परस्पर, सामूहिक भक्षण और विनिमय था, जिसका विरोध आर्य किया करते थे। आर्य राजाओं ने वाममार्गियों को नगरों और ग्रामों में प्रतिबंधित कर दिया था, इसलिए अधिकतर वाममार्गी  पहाड़ों में, निर्जन वनों व कंदराओ...

दीन-ऐ-इलाही

 अक़बर ने दीन-ऐ-इलाही के जरिये उच्च हिन्दुओ और उच्च मुसलमानो को पास लाने का भरकस प्रयास किया ,इस प्रयास में उसने हिन्दुओ के लिए  पवित्र समझी जाने वाली गाय की हत्या को निषेध करवा दिया था। नए मंदिरो को बनाने की छूट दे दी थी । मंदिरो और तीर्थ यात्राओं को कर मुक्त कर दिया था। उसका प्रयास था कि वह अधिक से अधिक उच्च हिन्दुओ को अपने नव धर्म की तरफ आकर्षित करे, ऐसा हुआ भी दीन-ऐ-इलाही को सबसे पहले अपनाने वाला  ब्राह्मण महेशदास अर्थात बीरबल ही हुआ । अक़बर हिन्दुओ के धार्मिक और जातीय मसलो में हस्तक्षेप नही करता था यही कारण रहा कि उसने निम्न जातियों के उद्धार के लिए कोई कार्य नही किया था। 'महान' कहलाये जाने के बाद भी  शासन काल में अछूतों का   जातीय शोषण / अत्याचार तो बना ही रहा,   कई कुप्रथाएं भी ज्यूँ की त्युं उसके राज में  चलती रही जिनको अंग्रजो ने आके खत्म किया , उनमे से कुछ कुप्रथाएं इस प्रकार की थीं- 1- काशी - करवट-  काशी धाम में  आदि विशेश्वर के मंदिर के पास कुंए मे कूद कर  भक्त अपनी जान दे देते थे , भक्तो की धारणा थी कि उस कुंए में मर...

बुद्ध से हिन्दू धर्म बना

 नाग, अहीर और बौद्ध- आज नागपंचमी है, नागपंचमी के दिन नाग को दूध पिलाने की परंपरा रही है जबकि नाग दूध पीता ही नहीं?  फिर यह परम्परा कैसे आई? कंही यह प्रचलन उस घटना का प्रतीकात्मक रूप तो नहीं जंहा एक नाग ( एक प्राचीन जनजाति का टोटेम) वंशीय कन्या सुजाता ने पेड़ के नीचे बैठे भूंखे बुद्ध को खीर( दूध) खिलाई थी? जंगल में नाग वंशीय जनजाति द्वारा ही सुरक्षा प्रदान की गई थी बुद्ध को। ऐसा हो सकता है कि बाद में नाग वंशीय  जनजातीय लोगो बुद्ध के प्रति आदर प्रकट करने के लिए पेड़ के नीचे या नाग टोटम होने के कारण बांबी के निकट दूध रख ' दूध पिलाने' की परंपरा चला दी हो? ।  वैसे भी वैदिकों के अनुसार भी नाग पंचमी अवैदिक पर्व है। तो फिर इसकी जड़ें बुद्ध से जुड़ी हैं?  नागवंशी लोग नागों से अपना सम्बन्ध दर्शाने के लिए अपनी जीभ को दो हिस्सों में कर लेते थे। मध्य प्रदेश के निवार(वर्तमान खंडवा) जिले और मथुरा के मथ्रा बंजारों में यह प्रथा सन 1950 तक भी प्रचलित थी जिसमे लड़के को अपने समाज में सम्मिलित करने के लिए सोने की गर्म छड़ी से उसकी जीभ को नाग के समान प्रतीकात्मक रूप से दो फाड़ कर दिए जाते थ...

रामायण में चैत्य और बुद्ध शब्द.

वाल्मीकि रामायण में जब हमुमान लंका में सीता जी की खोज करते हुए जाते हैं तो वो लंका का वैभव देख आश्चर्य करते हुए कहते हैं -  स्वर्गोस्य देवलोकाsयमिन्द्रस्येयं पूरी भवते ( वाल्मीकि रामायण, सुंदर कांड ,सर्ग -9 श्लोक 31)  हनुमान लंका को स्वर्ग के समान कहते ,इंद्रलोक के जैसा वैभवशाली कह आश्चर्यचकित हो उठते हैं। अब जानिए की लंका इंद्रलोक या स्वर्ग की तरह वैभवशाली क्यों थी। वाल्मीकि रामायण फिर कहती है - ' भूमिगृहांशचैत्यगृहान उत्पतन निपतंश्चापि'( सुंदर कांड , सर्ग 12, श्लोक 15 अर्थात हनुमान भूमिगृहों और चैत्यों पर उछलते कूदते हुए जाते हैं । चैत्य शब्द वाल्मीकि रामायण में बहुत बार आया है , अयोध्याकाण्ड में ही कम से कम तीन बार आ गया है। अब जानिए चैत्य शब्द का अर्थ- चैत्य- बुद्ध मंदिर ( संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ पेज 440)  चैत्य- चैत्यमायतने बुद्ध बिम्बे( मेडिनिकोष)  अर्थात चैत्य ,बौद्ध मंदिर को कहते हैं। कहने का अर्थ हुआ की लंका निश्चय ही बौद्ध नगरी रही होगी जंहा बौद्ध चैत्य बहुतायत थे । इसके अलावा , अयोध्या कांड सर्ग 109 के 34 वें श्लोक में कहा गया है- 'यथा हि चोरः स तथा हि बु...

अरब व बुद्ध, शून्य व माया, इस्लाम, ईसा, धम्म

 अरब में अंको का एक नाम हिंदसा भी है ,हिंदसा अर्थात ' हिन्द से आया हुआ '। इन अरबी अंको का अरब में प्रयोग होने से कोई एक हजार साल पहले इन अंको का प्रयोग असोक के शिलालेखों ( 250 ई. पूर्व) हुआ था । निश्चय ही यह बौद्ध भिक्षुओं द्वारा वंहा गया अथवा अरब व्यापरियो द्वारा अंक वंहा पहुंचे। इसी प्रकार अरबी का नौ-बहार भारतीय बौद्ध परम्परा नवविहार का रूपांतर ही है।   अरबो ने अपने जिस चकित्सा शास्त्र को यूनानी कहा वह दरसल बौद्ध भिक्षुओ द्वारा अपने गया 'आयुर्वेद' का ही रूप था । अरबो में इसका ज्ञान यूनानियों से प्राप्त होने के कारण इसका नाम यूनानी  रखा , यूनानी अरबो से पहले भारत आएं और इसका ज्ञान प्राप्त किया। अरब में हिजरी सन की दूसरी में बौद्ध साहित्यो का अरबी में खूब अनुवाद किया गया ,जिसे वंहा 'किताबुल-बुद' और 'बुदासिफ़' कहा गया । मुहम्मद साहब से पहले अरबों को बौद्ध धर्म का पूरा ज्ञान था । बहुत से प्रसिद्ध इतिहासकारो ने माना है कि अरब के लोग किसी समय बौद्ध धर्म को मानते थे। काबा में मूर्ति पूजा होती थी  ,वँहा 360 मूर्तिया थी।  मुहम्मद साहब वे मूर्तियां तोड़ दी थी किन्...

रामधारी सिंह दिनकर इस्लाम पर

  रामधारी सिंह 'दिनकर' ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'संस्कृति के चार अध्याय' में इसका विस्तृत जवाब दिया है।  रामधारी सिंह दिनकर ने इस विषय में कुछ महत्वपूर्ण बातों को लिखा है- 1) जब इस्लाम आया उसे इस देश में फैलने में देर नहीं लगी। तलवार के भय अथवा पद के लोभ से तो बहुत थोड़े ही लोग मुसलमान हुए, ज्यादा तो ऐसे ही थे, जिन्होंने इस्लाम का वरण स्वेच्छा से किया। बंगाल, कश्मीर और पंजाब में गाँव-के-गाँव एक साथ मुसलमान हो गए। शहरों के किनारों पर जो अछूत लोग बसते थे, उन्हें मुसलमान बनाने के किसी खास आयोजन की आवश्यकता नहीं हुई। ये अछूत शहरों के भीतर नहीं बस सकते थे, जहाँ ऊँची जातियों का प्राधान्य था और ये ऊँची जातियाँ अछूतों को पशु से हीन समझती थीं। सच पूछिए तो मुसलमानों के आगमन से पूर्व ही, इस देश में बहुत से हिन्दू वर्णाश्रम-धर्म को छोड़ एक ऐसी जगह पर जा खड़े थे, जहाँ वर्णाश्रम का कोई प्रभाव नहीं था। वे जात-पाँत को नहीं मानते थे। तीर्थ-व्रत और प्रतिमा पूजन में उनका विश्वास नहीं था। वे शून्य, अलख निरंजन या निराकार की उपासना करते थे। ऐसे विश्वासवालों का जब इस्लाम से सामना हुआ होगा, तब ...

दस धर्म लक्षण

  मनु ने वैसे तो धर्म के दस लक्ष्ण बताये है जो नैतिकता के हैं , परन्तु धर्म के कितने लक्षण हैं इसका ठीक ठीक अंदाजा नहीं है क्यों की श्रीमद भागवत के सप्तम स्कन्द में कहा गया है की धर्म के 30 लक्षण होते हैं। फिर भी यदि हम थोड़ी देर  मनु के दस लक्षणों (धृति, क्षमा, अस्तेय आदि ) लक्षणों को (जो की वास्तव में नैतिकता के लक्षण है) धर्म के लक्षण मान लेते हैं तो भी इनके लक्षण हमारे सामाजिक जीवन से सम्बंधित है। उनके इस कथन को सही माना जा सकता है जो उन्होंने मनुस्मृति में कहा  धर्म एव हतो हन्ति धर्मोरक्षित रक्षित: , तस्माद धर्मो न हन्तव्यो माँ नो धर्मो हतोsवधित: ,, ( 8/15) अर्थात हम यदि धर्म को समाप्त कर देंगे तो वह समाप्त हुआ धर्म हमारा भी अंत कर देगा. यदि हम धर्म की रक्षा करेंगे तो वह हमारी भी रक्षा करेगा . इसलिए धर्म का नाश नहीं करना चाहिए . कंही नष्ट हुआ धर्म हमें समाप्त न कर दे ' यंहा यदि धर्म उन दस नैतिक लक्षणों को बात है तो यह बात  माना जा सकता है की  हम शौच, इंद्री निग्रह आदि नहीं करेंगे तो हमारे सामाजिक जीवन को हानि होगी। पर  मनु महाराज उससे पहले यह भी कहते है...

आर्य विदेशी थे.

 पहला हाथी हड़प्पाइयों का है। दूसरा हाथी मौर्यों का है। हड़प्पाइयों को, मौर्यों को हाथी की जानकारी थी। किंतु आर्यों को हाथी की जानकारी नहीं थी। मध्य एशिया के पूरे इलाके में हाथी नहीं थे। आर्य लोग जब भारत आए, तब वे हाथी से परिचित हुए। वे आश्चर्य में थे कि भारत में ये कैसा पशु है? इसको तो हाथ है। वे सूंड़ की तुलना हाथ से किए और हाथी का नाम मृग हस्तिन रख दिए। वे मृग ( पशु ) से परिचित थे। किंतु हाथी से नहीं थे। मृग हस्तिन का अर्थ हुआ - हाथ वाला पशु। मृग का प्राचीन अर्थ पशु है। बाद में इसका अर्थ हिरण हुआ। शाखामृग ( बंदर ), मृगराज ( सिंह ) जैसे शब्दों में मृग हिरण का नहीं, पशु का वाचक है। मृग हस्तिन ही हस्तिन, फिर संस्कृत में हस्ती ( हाथी ) हुआ। अशोक काल में हाथी को गज कहा जाता था। दूसरे चित्र में हाथी के नीचे ब्राह्मी में गजतमे लिखा हुआ है। यह अभिलेख अशोक का है। जैसा कि आप जानते हैं कि अरब के लोग इमली से परिचित नहीं थे। भारत आकर जब वे इमली से परिचित हुए, तब वे इमली का नाम अरबी में तमर - ए - हिंद रखा। तमर - ए - हिंद का मतलब हिंद ( भारत ) का खजूर। वे खजूर से परिचित थे। किंतु इमली से नहीं ...