गर्भ
धरती हमारी माता केसे प्रेग्नेंट हुई आओ जाने धरती ने ही मंगल को जन्म दिया। तो मंगल हमारा भाई हुआ।
कहानी है चौखंबा कृष्णदास अकादमी वाराणसी की ब्रह्मवैवर्त पुराणम प्रथम भाग ब्रह्मखंडम अध्याय 9 की जो इस प्रकार है:–
भगवान उपेंद्र ( विष्णु ) बहुत खूबसूरत दिखाई दे रहे थे तो हमारी धरती माता कामबाण से पीड़ित हो कर खूबसूरत रमणी का रूप धारण कर के भगवान उपेंद्र के बेड के पास पहुंच गई। भगवान जी भी माता के साथ क्रीड़ा कौतुक करने लगे। प्रभु के अंग से जब वसुन्धरा के अंग का स्पर्श हुआ, तभी वे मूर्च्छित-सी हो गई। फिर भगवान ने धरती माता में वीर्य छोड़ दिया।
"भगवान विष्णु ने सुश्रोणी, स्थूल स्तनों वाली, विशाल नितम्बों वाली, सहास्य मुख, तथापि सुख-सम्भोग के कारण मूर्च्छित-सा देखा। उन्होंने वसुन्धरा को वक्ष से लगाया तथा उनका मुख चुम्बन किया।"
और निर्जन स्थान पर अकेली को छोड़ कर चले गए।
वहां उर्वशी आई, उसने कोशिशें कर के धरती माता को होश में लाया। पूछने पर धरती माता ने सारी कहानी बताई।
धरती माता संभोग से कमजोर हो गई थी। इतना तेजोमय वीर्य को धारण करने में असमर्थ थी सो प्रवाल ( मूंगा ) की खान में वीर्य को सुरक्षित रख लिया और उसी से भाई मंगल का जन्म हुआ।
ब्रह्म खंड इस पुराण का पहला खंड है। इसके बाद आता है प्रकृति खंड। उसके अध्याय 8 में यही कहानी है। उसके अनुसार जब वाराह ( सूअर ) अवतार ने धरती को कीचड़ या पानी से बाहर निकाला तो वाराह अवतार ने धरती को sex पीड़ित देख कर खुद भी पीड़ित हो गए और फिर उपयोगी शय्या का निर्माण करके 360 वर्ष तक माता धरती के साथ भोग किया। फिर सुख संभोग से धरती माता बेहोश हो गई।
इस कहानी में धरती माता ने वीर्य कहीं नहीं छोड़ा। खुद गर्भ से मंगल को जन्म दिया।
देवी भागवत महापुराण स्कंद 9 अध्याय 9 में भी यही कहानी है।
तीनों के पन्ने लगा रहा हूं।
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