दयानंद
दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश के अष्टम समुल्लास में एक मंत्र का कुछ भाग लिखा है जो इस प्रकार है " मनुष्या ऋषयश्च ये। ततो मनुष्या अजायन्त " इस सत्यार्थ प्रकाश लिखा है और दयानंद सरस्वती बोल रहे कि यह यजुर्वेद में लिखा है परन्तु मैं आर्य समाजियों के वेबसाइट खोल देखा तो 🤣 यह मंत्र आर्य समाजियों को यजुर्वेद में मिला ही नहीं है 🤣🤣🤣 दयानंद सरस्वती मंत्र तो लिखा लेकिन यह बताना कैसे भुल गया कि यजुर्वेद के किस अध्याय व मंत्र संख्या में लिखा है? नोट:- ★ आर्य समाजी आंख बंद करके दयानंद पर कैसे भरोसा कर लिया कि सत्यार्थ प्रकाश सही है जबकि दयानंद तो बिना रेफरेंस का बात लिखा है ? ★ जब आर्य समाजियों को यह मंत्र वेद में नहीं मिला तो यह निष्कर्ष निकलता है कि दयानंद को वेद को बारे में सही जानकारी नहीं थी फिर कैसे कोई दयानंद को महर्षि कहां जा सकता है ? ★जब मंत्र वेद में नहीं मिला तो यह कैसे जान लिया कि इसका अर्थ बड़ा रोचक है ?